Sunday, May 12, 2013

किस्सा आधार कार्ड का...

आज सुबह सुबह 9 बजे हमारे प्रिय जस्सी (जसप्रीत सिंह ढींगरा) जी की कृपा से 4 निठल्ले लोगों, मैं, ऋषभ, नित्य और जस्सी खुद, का थोडा कल्याण हुआ और सबने आधार कार्ड के लिए आवेदन भर दिया| पर इस प्रक्रिया में जो जो घटित हुआ उसका व्यख्यान करना मेरे सामर्थ्य के बहार है| फिर भी प्रस्तुत हैं उस ज़बरदस्त उधेड़ बुन के कुछ मुख्य अंश -

1. आधार कार्ड केंद्र के अन्दर जाने की कतार में एक घंटे खड़े अन्दर जाने का इंतज़ार -

नित्य      :     "यार पिछले 4 हफ्ते से motorcycle नहीं ले पा रहा हूँ| फ़ोन करके पुछा है|
                     आज दुकान 1 बजे तक खुलेगी| 1 बजे तक तो काम हो ही जाएगा| आज तो bike ले ही लूँगा"
ऋषभ      :     "नित्य, आज तो ना आ रही आपकी bike|"

जब हम लोगों की बारी आई तो सबसे पहले नित्य के दस्तावेज जांचे गए| प्रतिलिपि (copy) और मूल प्रति (original) दोनों की जांच के बाद जस्सी के दस्तावेज़ जांचे गए| मेरी बारी आने पर ~55 साल के जांचकर्ता बोले -
"आपके पास original papers तो होंगे ही| अब इतने लोग लाइन में खड़े हैं| सबका कब तक check करेंगे!"

2.
10 बजे
जस्सी को 22वां स्थान पर, नित्य को 23, मुझे 24 और ऋषभ को 25वें स्थान पर अपने अपने उँगलियों के निशान, photo और iris scan करवाने थे| थोड़ी देर इंतज़ार करने के बाद पता चला की एक भी कर्मचारी काम पर नहीं है| हम सबका पारा चढ़ने लगा ही था की हमें एहसास हुआ की जस्सी का पारा पहले ही उबल चुका था| ज्वालामुखी किसी भी समय फट सकता था|

3.
10:30 बजे
हैदराबाद के आधार कार्ड के कर्ता धर्ता को फ़ोन पर शिकात की गयी| इतने में एक operator, जो शायद रविवार के दिन रास्ता भटक कर centre पर आ गयी थी, उसे एहसास हुआ की शिकायत हो रही है| तुरंत जस्सी को बुला कर -

operator   :      "Sir,  क्या कर रहे हैं आप? आप कहें तो आपका काम पहले कर देती हूँ|"
जस्सी       :     "यह क्या बात हुई? हमसे पहले जो बैठे हैं उन्होंने क्या बिगाड़ा है?
                        बाकी खाली पड़े 3 कंप्यूटर पर कोई अभी तक क्यूँ नहीं है?"

ज्वालामुखी धधक रहा ही था

दूर बैठे बाकी हम तीन|
ऋषभ       :       "हाहा अभी इन सबकी बैंड बजने वाली है| Yo जस्सी"
नित्य       :       "मुझे तो डर है किसी को चपेट ना मार दे"

शिकायत दर्ज हो गयी| तब तक 9वें व्यक्ति का काम चल रहा था| हम चारों बगल की दूकान पर गन्ने का जूस पीने चल दिए|

ऋषभ       :       "कुछ भी कहें APSC, सरकारी नौकरी का अपना ही टशन है|"

4.
11 बजे: करीब 20 मिनट बाद, जूस पी के, पानी ले कर वापस आये|

"भैया जी, कौन सा नंबर चल रहा है?"
"9वां नंबर चल रहा है"

जस्सी       :       "चलो भाई, time  लगेगा, cafe nandini  से कुछ खा के आते हैं"
नित्य        :       "चलो भाई| फिर यहाँ से कार्ड का काम हो जाए, फिर bike लेने जायेंगे|"
ऋषभ        :      "नित्य, आज तो ना आ रही आपकी bike|"

5.
11:45 cafe nandini से वापस आ कर आराम से खा पी के वापस आये| ऋषभ की गलती, उसने कुछ नहीं खाया|
हमारी शिकायत का थोडा असर हुआ|  कोई एक नया officer जाएजा ले रहा था|
ऋषभ        :       "कितना number चल रहा है?"
कर्मचारी    :       "अभी तो HSBC वालों का बन रहा है|"
ऋषभ        :       "HSBC??? ये कहाँ से आये? ये चल क्या रहा है???"
कर्मचारी    :       "अभी HSBC वालों का बन रहा है|"
ऋषभ        :       "आप सरकारी कर्मचारी हैं या  HSBC की?"
कर्मचारी    :       "सर आप उनसे  (वही 55 साल के जांचकर्ता| शायद 55 साल की सरकारी नौकरी में उन्हें
                         random  काम को भी justify करने की कला आ गयी थी) उनसे बात करो|"
ऋषभ (जांचकर्ता के पास जा कर)
                :        "Uncle, भूख लगी है|"
जांचकर्ता  :         ??????????? ( ऋषभ को घूरने लगा)

शायद HSBC वालों ने अपने employees के आधार कार्ड के लिए मुहीम चलायी होगी|
तभी नित्य, जस्सी का प्रवेश -

नित्य      :        "अब यहाँ से सीधा bike लेने चलते हैं|"
जस्सी     :        "कौन सा number चल रहा है?"
"11 number तक हुआ है| अभी HSBC वालों का हो रहा है"

बस, फट पड़ा ज्वालामुखी| 
थोड़ी दूर पर जवालामुखी की गर्मी महसूस करते हुए-


ऋषभ       :      "हाहा अभी इन सबकी बैंड बजने वाली है| Yo जस्सी"
नित्य        :      "मुझे तो डर है किसी को चपेट ना मार दे"


जस्सी       :      "ये क्या चल रहा है| इतना धीरे काम| अब भी इन कंप्यूटर पर कोई नहीं बैठा है|
                        आप complain book लाओ| जो जो नहीं हैं हमें उनके against complain करनी है|"
Officer      :      "अरे सर, अभी एक और operator  आ रहा है| वो आज आया नहीं इसलिए थोडा लेट हो गया|"
जस्सी       :      "हाँ तो जो नहीं आया हमें उसके against complain करनी है|"
Office       :      "आप तो नाराज़ हुए जा रहे हैं| हमने सच बताया तो आप और गुस्सा हो रहे हैं| यूँ तो हम झूठ भी बोल सकते थे|"

(सभी सकते में - ये क्या था)

जस्सी (6ft 3in से 6ft 5in हो कर) "तो तुम हमसे झूठ भी बोल सकते हो!!!!!"
बाकी लोग  :     "Sir Sir Sir, नहीं ऐसी बात नहीं है|"
Officer       :      "Sir, वो operator आ रहा है| इन सब कामो में थोडा टाइम लगता है|"
ऋषभ (जो शायद cafe nandini में ना खा कर पछता रहा था)
                  :      "टाइम लगता है तो यहाँ एक Food Counter क्यूँ नहीं खुलवा देते हो?"

(2 मिनट तक सन्नाटा छाया रहा| ऋषभ के बोल सुनामी की तरह आये और सारे logics की तबाही मचा के निकल गए| जब तक जस्सी और नित्य इस सदमे से उबरते तब तक देर हो गयी थी| officer भी वहां से निकलने लगा)

जस्सी      :     "ये कोई बात है? हम यहाँ इतनी देर से बैठे हैं"
                     (पहले पानी, फिर गन्ने का जूस, फिर cafe nandini - वैसे हम शायद ही 20 मिनट "बैठे" होंगे)

तभी अन्दर से एक आवाज़ - "Sir, तीसरा operator भी आ गया|"

ऋषभ     :      "कुछ भी कहें APSC, सरकारी नौकरी का अपना ही टशन है|"

6
12:10 बजे
"भैय्या, कौन सा नंबर चल रहा है?"
"अभी 17 नंबर चल रहा है"

नित्य      :       "चलो जल्दी जल्दी हो रहा है अब| यहाँ से फटाफट bike लेने जायेंगे|"

थोड़ी देर और इंतज़ार किया| इसी बीच मैं और जस्सी phone पर एक बाज़ी chess की खेल कर ख़त्म कर चुके थे|

"भैय्या कौन सा नंबर चल रहा है?
"अभी 16 चल रहा है"
"हैं??? अभी तो बोला था की 17 चल रहा है!!!"
"अरे गलती से गलत नंबर बता दिया था "

जस्सी ने computer room में डेरा दाल दिया|

ऋषभ     :       "नित्य, आज तो ना आ रही आपकी bike"

7
12:20 बजे
operator :       "Security, इन लोगों को समझ नहीं आ रहा है| इनको बोलो बहार जा के बैठें|
Security  :       "चलो भाई बहार जा के बैठो, यहाँ नहीं|"
जस्सी     :       "हम यहीं बैठ रहे हैं, इतनी देर से इंतज़ार कर रहे हैं| अब यहीं बैठेंगे| हमारा अभी आने वाला है"
operator (टांग खींचने के लहजे में)
               :       "हाँ हाँ, lunch के बाद तो इनका हो ही जाएगा|"
जस्सी (बैठे बैठे भी 6ft दिखायी देते हुए| कुछ देर पहले ही आये हुए नए operator की तरफ)
               :       "इनको तो मैं lunch के लिए जाने ही नहीं दूंगा|
Security   :       "नहीं नहीं sir, आप बैठिये कोई बात नहीं"

8
12:45 बजे
"नंबर 22"
जस्सी पहुंचा scanning के लिए
"नंबर 23"
नित्य पहुंचा scanning के लिए


ऋषभ      :       "APSC, आपको क्या लगता है की हम अब कौन सी सरकारी नौकरी कर                                                        
                       सकते हैं?
APSC     :       "Lecturer बन सकते हैं"
ऋषभ      :       "नहीं नहीं, उसमें तो PhD करनी पड़ेगी| Time लगेगा"
APSC     :       "IAS बन सकते हो"
ऋषभ      :        "हो गया!!"

Scanning के दौरान
अब क्यूंकि camera normal इंसानों के लगाया गया था, ज़ाहिर है जस्सी के लिए वो सही नहीं था| जस्सी का केवल कमर से गर्दन तक का ही फोटो आ पा रहा था
operator ने camera ठीक किया| चेहरा तो आया पर पगड़ी काटने लगी

जस्सी      :      "नहीं नहीं |पूरी फोटो आनी चाहिए|"
operator   :      "नहीं सर| अब तो मुश्किल है| कोशिश करता हूँ|"
                       "Sir, अपने details चेक कर लीजिये"

Details एक तरफ English और बगल में Telegu में लिखे हुए थे|
जस्सी (55 वर्षीय जांचकर्ता से)
                :      "Excuse me, क्या आप check कर सकते हैं की Telegu में ठीक है की नहीं?"
जांचकर्ता  :      "Sir, ठीक तो है|  क्या प्रॉब्लम है?"
जस्सी       :      "ये यहाँ English में '4th floor' लिखा है, वो यहाँ  Telegu में भी '4th floor' लिखा है!"

9
1:15 बजे
नित्य       :      "सालों, कल तुम सब मेरे साथ सुबह 9 बजे bike लेने चलोगे!!!!"

ऋषभ      :       "कुछ भी कहें APSC, सरकारी नौकरी का अपना ही टशन है|"

Sunday, September 16, 2012

अधूरी-पूरी कहानी

This is my attempt at a new style of poem. I call it "Split Poem". The poem starts as a single thread or line of thought. Then splits into two, representing two parallel lines of thoughts or parallel set of events. In this particular poem, the emphasis is more on the introduction of the concept rather than the content. Also, here the parallel thoughts again get converged into one. So you can even call it a  "Split and Merge Poem".


दिल पगला फिर से मचल उठा,
मौसम की थोड़ी बेईमानी!
फिर आज महक के फूल खिला,
रंग बिखराती वो तितली आई।
"खिला इसी ख्वाहिश में हर दिन
बिखराता महक मैं भीनी सी।
एक झलक पड़े उस तितली की
दो बातों की हो लेनी देनी"
"उडी इसी ख्वाहिश में हर दिन
फैलाती मैं पंख सतरंगी
पड़ जाए नज़र उस फूल की मुझपे
 दो बातों की हो लेनी देनी"
"क्या सोचती होगी मेरे बारे में?
सोचती होगी या भी नहीं?
हज़ार फूल हैं इस बगिया में
आगे उनके मैं कुछ भी नहीं।"
"क्या देखा होगा उसने कभी?
भाये होंगे रंग मेरे भी?
ऐसे फूल पर इठलाने वाली
तितलियों की आखिर कमी नहीं "
"जब पड़ती हैं उसके पंखों पर
रंगीन हो जाती किरणे भी।
वो उड़ती रहती आज़ादी से
मैं बैठा जड़,  चिर स्थायी।"
"जब पड़ती ओस पर पंखुड़ियों की
चमक उठती हैं किरणें भी
झूलता वो तो मस्त पवन में
मेरा तो कोई ठोर नहीं "
"देखो तो कोई मेल नहीं,
 इकरार न बन ले बोझ कहीं!
दूर से बुझती प्यास ये मन की,
मेरे प्रेम की शायद नियति यही।"

Wednesday, April 25, 2012

A River That's Time

Taking a break, catching hold of shore
Watching the time, watching its flow
Smiling at its speed, it's highs and lows
Dripping with the past, I'm sitting on my own

Some drops of time, they just don't dry
Some don't stay, how hard I try
Some soaked by eyes, get the dreams alive,
Some taste like memories, fill the cup of life!

Straights, bends, turns, splashing with the rocks,
Few whirls go deep, few waves get strong
Strait unknown, its traits unknown,
Its a fall or a sea, don't know where it goes....

My clothes are wet, I'm feeling the cold
Nothing do I feel, till I go with the flow
Smiling at its speed, its highs and lows,
Enjoying the ride, I am flowing along!

Thursday, December 15, 2011

चेहरे वाले


" मुखौटे ले लो मुखौटे... मुखौटे ले लो"

"अरे ओ मुखौटे वाले भाई साब... ज़रा इधर आना"

"जी बाबूजी, कहिये, कौन सा मुखौटा दूं आपको? एक से एक उम्दा माल है मेरे पास... देख के दिल खुश हो जाएगा!!"

"अरे नहीं, मुझे मुखौटा नहीं चाहिए..."

"बाबूजी एक बार देख तो लो! मेरे पास कई तरह के मुखौटे हैं, कई तरह के चेहरे हैं.... रोते, हँसते, दोस्त के, दुश्मन के....."

"भाई, मुझे मुखौटा नहीं लेना. मुझे तो बस ये पता पूछना है. आप जानते हैं इस पते पर जाने का रास्ता क्या है?"

                सच्चाई गली,
                शराफत मोहल्ला,
                जिला - साफ़ दिल 

"पर बाबूजी,  वहाँ आपका कौन रहता है?"

"वहाँ?? वहाँ तो मेरे दोस्त, भाई, रिश्तेदार, हमदर्द, बहुत लोग रहते हैं. तुम्हें उससे क्या फर्क पड़ता है? तुम बताओ तुम्हें रास्ता पता है या नहीं?"

"अरे बाबूजी मुझे क्या फर्क पड़ेगा. मैने तो बस ऐसे ही पुछा. मुझे बस लगा जैसे आप चेहरा पहनना भूल गए हैं."

"चेहरा पहनना भूल गए हैं? क्या मतलब है तुम्हारा?"

"बाबूजी, आप क्या सड़क पर पहली बार निकले हो?"

"हाँ, मैं इन राहों से थोडा अनजान हूँ."

"तभी बाबूजी आपको सड़क की चाल और मोड़ों के बारे में नहीं पता. चेहरों के बारे में नहीं पता. आप जिस तरह, बिना कोई चेहरा पहने अपने दोस्तों हमदर्दों  को ढूँढने निकले हैं, आपको उन्हें ढूँढने में बहुत देर लगने वाली है...... हो सकता है न भी मिलें!"

"क्यूँ?"

"आप जिस जगह पर उन्हें खोजने जा रहे हैं वहाँ तो अब शायद ही कोई रहता है बाबूजी. वो गलियां छोड़ कर सब चले गए."

"क्या? क्या कह रहे हो? मैने तो सुना था वहां अब भी लोग रहते हैं. मैने उनके बारे में कहानियों में सुना है, घर, मंदिर, स्कूलों में लगी तस्वीरों में उन्हें देखा है और किताबों में पढ़ा है. वो आज भी जिंदा हैं"

"मेरी बातों पर यकीन न आये तो लीजिये, ये एक कामयाब इंसान का चेहरा............ ज़रा पहन के तो देखिये."

"................................. अरे......................  लो वो देखो, जिन लोगों को मैं ढूंढ रहा था वो तो मेरे पास ही चले आ रहे हैं!!! मेरे दोस्त, मेरे रिश्तेदार.... हा हा हा, मुखौटेवाले, लगता है तुम्हारा यह चेहरा मेरे लिए बहुत अच्छा है....................... एक मिनट रुको............... एक और श्रीमान मेरे पास आ रहे हैं........................ अरे, एक और!!........................... और एक................................... और एक...................... ये तो पूरी की पूरी भीड़ ही मेरी तरफ दौड़ी आ रही है!!!! देखा, और तुम कहते थे कि "सच्चाई गली" में कोई नहीं रहता. सब के सब तो यहाँ हैं, सब यहीं हैं! .................... अरे! कहीं यही "सच्चाई गली" तो नहीं?? हाँ, यही वो जगह है. हाँ, हाँ बिल्कुल यही वो जगह है! मुखौटेवाले, तुम एकदम मूर्ख हो. न जाने क्या क्या कह रहे थे. तुम तो इस जगह के बारे में कुछ नहीं जानते. यही तो वो जगह है जहाँ मेरे दोस्त, मेरे सच्चे साथी रहते हैं!

"बाबूजी, अब ज़रा यह चेहरा हटा के देखो क्या होता है!?!"

"मुखौटेवाले, तुम भी बड़े अजीब हो! ऐसा क्या हो जाएगा इसे हटाने से. और वैसी भी, मुझे जिनसे मिलना था वो तो मुझे मिल ही गए हैं! फिर भी तुम कहते हो तो हटा देता................................. अरे....................... हे..!!!!....... दोस्तों!!!!............ भाई...................... अरे तुम सब कहाँ जा रहे हो? मुझसे दूर क्यूँ जा रहे हो? क्या हो गया है तुम सबको???? अभी दो घडी पहले तो तुम सब मेरे पास आना चाहते थे. अभी क्या हुआ तुम सबको???...... मुक-मुक-मुखौटेवाले...... ये... ये सब क्या हो रहा है?"

"मैं आपको समझाता हूँ. बाबूजी यह बताइए, आपको चारों ओर क्या दिख रहा है?"

"लोग ही लोग हैं, पर मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा!"

"बाबूजी, आप भी धोखा खा गए ना! ये इतनी प्यारी सी, सुन्दर सी दिखने वाली दुनिया और कुछ नहीं बस एक कंक्रीट का एक जंगल है! इस जंगल में भटकने वाले और कोई नहीं इंसान के मुखौटे पहने जानवर हैं. ये वही जानवर हैं जिन्होंने साफ़ दिल और सच के गलियारों में रहने वाले इंसानों को डरा धमका कर भगा दिया है. ये दिन में एक नहीं, दो नहीं हजारों मुखौटे बदलते हैं. जिससे मिले, जिससे जैसा काम निकला, उसके मुताबिक चेहरा. जब तक आपके पास एक कामयाब इंसान का चेहरा था ये जानवर दोस्तों, भाई, रिश्तेदारों और हमदर्दों का चेहरा पहन कर आपके पास आ रहे थे. आपका असली चेहरा देख कर सबने मुंह मोड़ लिया."

"तो.... तो क्या अब वहाँ कोई दोस्त, कोई रिश्तेदार, कोई - सच्चा - इंसान नहीं रहता?"

"नहीं बाबूजी... किताबें, दादी - नानी की कहानियां, घर, स्कूलों में लगी वो तस्वीरें कभी झूठी नहीं हो सकती. बस ज़रुरत है तो उन लोगों को ठीक से खोजने की.  कभी न कभी वो लोग आपको मिलेंगे. कितना वक़्त लगेगा, कोई नहीं कह सकता. आपका सच्चा साथी वही होगा जो बिना कामयाबी के चेहरे के आपके पास आये!"

"शायद तुम ठीक कहते हो, मुखौटेवाले. शायद तुम ठीक कहते हो........ पर मैं तो चला था एक साथी, एक दोस्त, एक रिश्तेदार को ढूँढने. मैं अपनी इस तलाश के लिए कब तक भटकूँ? कहीं मैं ऐसे ही सच्चाई की गलियों में हमेशा के लिए अपनी खोज में भटकता रह गया तो? अगर मुझे कभी वो लोग नहीं मिल पाए तो?........................... अगर कामयाबी के चेहरे से मुझे दोस्त, साथी मिलते हैं तो इसमें बुरा क्या है? ज़रुरत है तो बस एक कामयाबी के चेहरे की . जब तक वो चेहरा मेरे पास है, मेरे साथी मेरे साथ हैं, मेरे पास दोस्त होंगे, सारे लोग मेरे साथ होंगे. उन सबके पास सच के चेहरे होंगे! मेरी खोज पूरी होगी. चाहिए तो बस एक कामियाब चेहरा!!!......................... मुखौटेवाले, क्या तुम मुझे वो कामयाबी वाला चेहरा दोगे? मैं तुम्हें हर कीमत देने को तैयार हूँ. तुम जो चाहो करने को तैयार हूँ!"

"हा हा... क्यूँ नहीं बाबूजी, मेरा तो काम ही मुखौटे बेचना है. पर जब आप इस मुखौटे के लिए कुछ भी करने को राज़ी हैं, तो बस मेरे लिए आप एक काम करना और मुखौटा ले जाना"

"हाँ हाँ, मैं कुछ भी करूंगा. मुझे बस वो मुखौटा चाहिए. मुझे बस कामयाबी का चेहरा चाहिए. बोलो मुझे क्या करना है?"

"ये लो मुखौटा बाबूजी..... बस आपको ये याद रखना है की यह मुखौटा हमेशा ठीक से पहनना है. ढीला नहीं. यह कभी गिरे नहीं. आईने के सामने जा के पहनिए इसे!"

"बस इतनी सी बात? इस चेहरे को मैं कभी गिरने नहीं दूंगा! पक्का.................. आइना कहाँ है? ज़रा ध्यान से पहनूं इसको.............. अहा, यह रहा आइना..................... न...न... नहीं ..... नहीं, ये नहीं हो सकता ........ मुखौटेवाले, ये नहीं हो सकता. मेरा.. मेरा ... मेरा अपना चेहरा??? मैं... मैं एक जानवर..................."

"मुखौटे वाला.... मुखौटे ले लो मुखौटे.............................!!!!
मुखौटे ले लो... मुखौटे............
पसंद है अब तो सबको चेहरे,
सहते - देते धोके पे धोके.
बोला दुनिया को बुरा भला पर
कभी न देखा अपना चेहरा!!"

Tuesday, May 3, 2011

विषय : जिंदगी, समयसीमा : जीवनकाल

याद नहीं पर जाने कब से
बैठे कुछ पहचाने से कमरे में
हाथ में थामे कलम सोचते
जवाब जिंदगी के इम्तिहान के

 

इस इम्तिहान के सब पन्ने रंगीन हैं
हर रंग की स्याही मिलती है
केवल जवाब के अंक नहीं होते
रंगों का मिलना भी ज़रूरी है

 

न मिटा सके, न बदल सकें
जवाब की स्याही अनमिट है
सही - गलत हर एक जवाब से
जीवन की कहानी बनती है

 

कुछ सवालों के विकल्प अनगिनत
और कुछ के कोई विकल्प नहीं
कुछ सवाल इतने उलझे से
हर सवाल उनमें उलझा सा

 

किसी जवाब के इंतज़ार में
कहीं वक्त न पूरा गुज़र जाए
इस कमरे से बहार आने पर
कोई अफ़सोस न रह जाए

 

ना जानूँ मैं क्या है इसमें
सफल - विफल का पुरस्कार...
आज सवालों में फिर उलझा हूँ,
पर बैठा हूँ
हाथ में थामे कलम सोचते
जवाब जिंदगी के इम्तिहान के

Monday, April 25, 2011

हाँ! शायद चाँद समझता है

हाँ! शायद चाँद समझता है
जब भी उसको देखता हूँ
वो मुझको देख के हँसता है
हाँ शायद चाँद समझता है

 

वरना क्यूँ मेरा दिल बहलाने
अपनी चांदनी के रंग बिखराता
इस बहती ठंडी हवा से मुझको
सुकून के दो मीठे बोल सुनाता

 

शायाद वो भी कभी तरसा है
तारों में वो भी अकेला है
अपना हाल छुपाने को
बादल के पीछे छुपता है

 

हाँ शायद चाँद समझता है…

Thursday, September 16, 2010

Don't worry I’ll get over you!!

The more I know you,
The more I find
Now that I know more
Who am I.
I am the moon of
Cool dark nights,
And you are the sun of my
Blue warm sky.

Now people find me happy,
And people find me bright
But its all your reflection,
What they call my moonlight
Every time I look at you,
You stun my eyes
Your smile is the reason why I
Smile and shine.

I wish that you could see the sea
It’s love that’s in my heart
It tides, when far or close to you
As heart starts beating fast
Thousand stars surround me but
One thing you should know
Nothing but your presence is what
Always makes me glow.

I always wander round the globe,
I wake up all the nights,
Just to catch a glimpse of you,
To keep you in front of eyes.
You don’t have to trust my words,
Reject them all as lies.
But if ever want to know the truth
Just ask the fireflies.

I know that we can never meet
No matter how I try.
Also I know fairly well that
We’re days and nights.
But you shouldn’t ever worry for me
Always stay as you are
For me; I’ll get over you
Let forever pass!!